पासपोर्ट और नागरिकता का ये नया विवाद क्यों? 

बीते 24 जून को ‘पासपोर्ट सेवा दिवस’ था। विचित्र संयोग कि उसी दिन पासपोर्ट और नागरिकता को लेकर देश के नागरिक जीवन और मीडिया में अनोखी और शायद बेमतलब चर्चा छिड़ गई। वजह बना विेदेश मंत्रालय से जारी हुआ एक वक्तव्य। इसमें कहा गया कि पासपोर्ट एक ट्रैवेल परिपत्र है, नागरिकता का प्रामाणिक या निर्णायक परिपत्र नहीं है। अगर सिर्फ कानूनी और तकनीकी दृष्टि से देखें तो इस बयान को गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन मतदाता-सूची के स्पेशल इन्टेसिव रिवीजन(SIR) के मौजूदा दौर में जब नागरिकता और मतदाता पहचान को लेकर देश के बड़े हिस्से में विवाद और भ्रम की स्थिति बनी हुई है और एक राज्य में ‘ठोस साक्ष्य न पेश करने’ की दलील पर लाखों लोगों के नाम काटे गये थे; विदेश मंत्रालय के उक्त बयान पर विवाद उठ खड़ा हुआ।

लोगों का एक हिस्सा सवाल उठाने लगा कि पासपोर्ट बनाम नागरिकता पर इस तरह के बयान की जरूरत क्यों महसूस की गई? बिहार चुनाव से पहले ‘आधार’ को लेकर काफी विवाद खड़ा हुआ था। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से चुनाव आयोग को हिदायत भी दी गई कि आधार को वह उन दस्तावेजों की सूची में शामिल कर ले, जो मतदाता बनने के लिए जरूरी माने गये हैं। लेकिन ‘आधार’ के बावजूद अनेक लोगों के नाम मतदाता सूची में काटे गये। 

‘आधार’ सहित कुछ अन्य सरकारी महकमों द्वारा जारी अलग-अलग कार्ड किसी व्यक्ति या उसके स्थान आदि की पहचान जरूर कराते हैं पर उनमें नागरिकता या राष्ट्रीयता का स्पष्ट उल्लेख नहीं होता। ऐसा दस्तावेज तो भारतीय पासपोर्ट ही है। हर भारतीय के पासपोर्ट के ‘कवर’ के पीछे के पहले पेज पर नागरिकता कालम के सामने हर पासपोर्ट-धारक की राष्ट्रीयता- ‘भारतीय’ लिखा होता है। ऐसे में विदेश मंत्रालय की तरफ से ऐसा बयान जारी करके की जरूरत ही क्या थी? मजे की बात है कि भारतीय चुनाव आयोग ने अपने विवादास्पद प्रकल्प-एसआईआर के लिए भी मतदाता बनने या बने रहने के लिए जिन 11 दस्तावेजों को सबसे विश्वसनीय मानते हुए जो सूची जारी की थी, उनमें पासपोर्ट प्रमुखता से दर्ज है।

यह बात भी सच है कि देश में सर्वाधिक छानबीन के बाद जारी किय जाने वाला पहचान का कार्ड या परिपत्र पासपोर्ट ही होता है। फिर ऐसे भरोसेमंद सरकारी दस्तावेज पर यह टिप्पणी क्यों आई? क्या इससे हमारे अपने एक शासकीय निकाय ने भारतीय पासपोर्ट की हैसियत गिराने जैसा काम नहीं किया? लोगों में संदेह बढ़ने लगा और चर्चा चल पड़ी कि कहीं सरकार नागरिकता के सवाल पर कोई नयी पहल तो नहीं करने जा रही है?

मुख्यधारा मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर यह सवाल बहुत तेजी से उभरा है और इसे लेकर तरह-तरह के विमर्श सामने आने लगे हैं। इन विमर्शों की चर्चा करने से पहले ये जानना जरूरी है कि भारत में नागरिकता का कोई एकल ‘विशिष्ट कार्ड’ नहीं जारी होता। किसी व्यक्ति के नागरिक होने के लिए जो जरूरी वैधानिक या प्रामाणिक दस्तावेज होते हैं, इनमें जन्म प्रमाण पत्र को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। भारतीय नागरिकता अधिनियम-1955 में जन्म, वंश, देशीकरण या प्राकृतिकरण(नेचुरलाइजेशन) से नागरिकता तय होती है। भारतीय पासपोर्ट सन् 1967 के पासपोर्ट एक्ट के तहत जारी और नियंत्रित होता है। यानी नागरिकता और पासपोर्ट, दोनों के कानून अलग-अलग हैं।

अगर गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने इस मसले को सहज और सरल बनाने की कोशिश की होती तो आज जैसे विवाद कभी उठते ही नहीं। दोनों के अधिनियम में किसी एक खास प्रावधान को जोड़कर इनके बीच सम्बद्धता कायम की जा सकती थी, जैसा दुनिया के कई प्रमुख देशों में मौजूद है। यह बात अपनी जगह है कि भारत सहित कई देश खास स्थिति में गैर-नागरिकों को भी अपने पासपोर्ट जारी कर सकते हैं। पर ऐसा बहुत कम होता है। ऐसे मामलों के लिए नागरिकता और पासपोर्ट कानून में एक प्रावधान जोड़ा जा सकता था। 

यह सवाल बहुत विचारणीय है कि पासपोर्ट पर तो उसके धारक व्यक्ति की राष्ट्रीयता-पहचान भारतीय के रूप में लिखित तौर पर मौजूद रहती है। इसमें आज तक कोई बदलाव नहीं हुआ है। फिर इसे राष्ट्रीयता की पहचान या उसे पुष्ट करने वाले दस्तावेज के तौर पर न मानने का क्या औचित्य हो सकता है? सरकारी स्तर पर दबे स्वर में कुछ टिप्पणियां आई हैं कि देश में फर्जी पासपोर्ट बनाने के भी कुछ वाकये सामने आये हैं। लेकिन यह तो बहुत ही कमजोर और बेमतलब दलील है। अगर फर्जी ढंग से पासपोर्ट बना लेने के कुछेक मामले सामने आये हैं तो उनके आधार पर देश के करोड़ों लोगों के वैध पासपोर्ट पर सवाल क्यों उठाया जाये? भारत में इस वक्त 9.5 करोड़ लोगों के पास वैध पासपोर्ट है।

संभव है, यह संख्या इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कुछ और बढ़ गई हो।  देश से बाहर यात्रा करने वाले या काम करने वाले या यहां लंबे समय से रह रहे हर भारतीय के लिए उसका अपना पासपोर्ट ही उसकी राष्ट्रीयता की पहचान और सर्टिफिकेट है। दुनिया के अन्य देश पासपोर्ट पर लगे उसके वीजा को देखकर ही उस व्यक्ति को अपनी जमीन पर रहने की इजाजत देते हैं। लेकिन आज अपने ही देश के मंत्रालय द्वारा जब पासपोर्ट को नागरिकता या राष्ट्रीयता की पहचान कराने वाले दस्तावेज मानने से इंकार किया जा रहा हो तो परदेस में रहने वाले साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा भारतीयों का ‘भगवान ही मालिक’ है!

जर्मनी की नागरिकता ले चुके फ्रैंकफर्ट के पास रहने वाले भारत में पैदा हुए और पले-बढ़े बालेंदु गोस्वामी ने इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए अपनी फेसबुक पोस्ट में कल लिखा, ‘अगर पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो फिर नागरिकता का प्रमाण आखिर है क्या? पूरी दुनिया में पासपोर्ट को किसी देश की नागरिकता का सबसे महत्वपूर्ण सरकारी प्रमाण माना जाता है। लेकिन भारत से जो खबरें और बयान आ रहे हैं, उन्हें सुनकर हैरानी होती है। ऐसा लगता है जैसे देश में कानून से ज्यादा भ्रम फैलाया जा रहा है।’

अपने देश के अलग-अलग हिस्सों से भी इस मामले में बहुत चिंता जताती टिप्पणियां आ रही हैं। अनेक लोगों ने सोशल मीडिया में आशंका जताई है कि सरकार शायद जल्दी ही सीएए-एनआरसी जैसा अपना कोई प्रकल्प या योजना लेकर आ रही होगी! इसीलिए पासपोर्ट जैसे बेहद महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज पर ऐसे बयान दिये जा रहे हैं। इस बारे में लोग दलीलें भी दे रहे हैं। यह बात सही है कि भारत विभिन्न समुदायों की आबादी में उनके बीच से पासपोर्ट धारकों की औसत संख्या निकाली जाये तो उसमें औसत का प्रतिशतांक दो अल्पसंख्यक समुदायों का अपेक्षाकृत अधिक है।

ये समुदाय हैं-मुस्लिम और सिख। देश के जाने-माने लेखक-वैज्ञानिक गौहर रजा ने इन पंक्तियों के लेखक से बातचीत में कहाः ‘ ऐसा लगता है, इसके पीछे वही इनका पुराना मुद्दा सीएए-एनआरसी हो सकता है। शायद वे नये सिरे से नागरिकता का अलग रजिस्टर बनाना चाह रहे हों! हमारे देश में आबादी के हिसाब से ज्यादा लोगों के पास पासपोर्ट नहीं होता। उनको लगता है कि जिनके पास होगा उनकी नागरिकता की वैधता पर आंख मूंदकर यकीन न किया जाये!’  

ऐसी आशंकाओं और अटकलों के मद्देनजर सरकार को चाहिए कि वह देशवासियों और परदेस में रहने वाले भारतीयों को इस बाबत आश्वस्त करे कि वैध और गहन छानबीन की प्रक्रिया के बाद बने पासपोर्ट जैसे हर सरकारी दस्तावेज या परिपत्र को वह पहले की तरह तरजीह देती रहेगी। किसी भी नागरिक को, चाहे जिस किसी समुदाय, समाज, जाति या धर्म से क्यों न हो, उसे बेवजह परेशान नहीं होने दिया जायेगा। ऐसा करने से समाज के एक उल्लेखनीय हिस्से में पैदा हुआ ‘कन्फ्यूजन’ दूर होगा।

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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